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हम अपने आप से कुछ यूं बदला लेते हैं

हमपे सितम करने वाले को भी दुआ देते हैं।

यूं तो हमें हंसने का भी नहीं है इल्म

उनसे भले गम भी मिले तो मुस्करा लेते हैं।

चोरी छिपे करते है उनका दीदार औ जुस्तजू

सामना हो जाए तो फिर नजरें झुका लेते हैं।

एक झूठी आस है दिल को समझाने की दोस्तो

फिर भी चाहत से बचने का मश्विरा देते हैं।

फसाना ही निराला है हमारी गमे जिन्दगी का

जब सुनाते है कांटो को भी रुला देते हैं।

ए जालिम वफा न सही बेवफाई तो निभा

पिला दे जहर मगर प्यार से पिला।

साथ ताउम्र न दो तो कोइ शिकवा नहीं

पर जो वादे किये थे वो तो निभा।

खाक वो ख्वाब हो गए होंगे

फिर परेशां जनाब हो गए होंगे।

उनके होठों पे तो कलियां होती थी

अब तो हंसी में भी गुलाब हो गए होंगे।

तसव्वुर, दीवानगी, अश्क- औ- जज्बात

जवां वो शबाब हो गए होंगे।

मैं भी आया था उनकी महफिल में

सुनके वो बेनकाब हो गए होंगे।

होता कैसे दर्दे दिल कम “शीलू”

साकी भी अब खुद शराब हो गए होंगे।

 

 

तेरी यादों को समेटकर रखें भी तो कहां

दामन तो पहले ही शिकवों से भरा है।

एक ही सफर में

थक कर रुका हूं

पूरे तेंतीस पडावों पर…..

उतावलेपन में

कहीं भी

ठहर कर नहीं देखा

कि कहां क्या है…..

बस यूं ही

कहीं कहीं का

याद है कुछ कुछ….

शायद वह पांचवा पडाव था…..

पापा ने

पडोस के लडके को

पीटने की सजा दी थी

और फिर

गले भी लगाया था,

समझाया था

तेरहवें पडाव पर

वह सुमन और……..

अठाइसवां पडाव था वह शायद…….

जब रितु ने

स्कूल जाने से मना किया था

और सजा में

उसे रहना पडा था भूखा।

यही हाल है बस कहीं कहीं का

याद है कुछ कुछ.

क्योंकि

एक ही सफर में

थक कर रुका हूं

पूरे तेंतीस पडावों पर…..